वैसे बाटा कंपनी तो अपने जूते के लिए प्रसिद्ध है ,पर जूते के के साथ साथ ये कंपनी मौजे, बेल्ट आदि का भी निर्माण करती है।
बाटा कंपनी की शुरआत 24 अगस्त 1894 को ,टॉमस बता के द्वारा हुई थीं।
ये तो संक्षिप्त परिचय था इस कंपनी के बारे में अब चलिए विस्तार से जानते हैं..... की कैसे 2 सिलाई मशीन से स्टार्ट हुई ये कंपनी अब दुनिया की सबसे ज्यादा जूते बनाने वाली कंपनी में से एक बन चुकी है।
- टॉमस बाटा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो जूते सीलने का काम यानी की मोची का काम करता था ,टॉमस बाटा से पहले उनकी 10 पीढ़ी यही काम करते हुए आ रही थी ,पर टॉमस बाटा ने अपने इस पारम्परिक बिज़नेस को और आगे ले जाने की सोची और अंत में अपनी माँ से 360 डॉलर उधार लिया, जिससे 2 सिलाई मशीन खरीदी और अपने भाई एंटोनिन और अपनी बहन एन्ना के साथ मिलकर 24 अगस्त 1894 को बाटा कंपनी की स्थापना कर डाली ,शुरुआत में अधिक पैसे ना होने के कारण उन्होनें कैनवास से ही जूते बनाने स्टार्ट किया ,जिसकी खूब बिक्री हुई ,यही कारण था की उन्होनें अपने साथ 10 और कर्मचारियों को रख लिया।
- एक दिन जब टॉमस बाटा सुबह सुबह अखबार पढ़ रहे थे तो उनकी नजर एक ऐसे आर्टिकल पर गई जिसमें अमेरिका में जूते बनाने वाली आधुनिकतम तरीकों को बताया गया था, फिर क्या था टॉमस बाटा ने भी अपने साथ तीन कर्मचारियों को लिया और अमेरिका पहुंच गए।
- वहां से आने के बाद उन्होनें बोटावकी नाम से जूता बनाना चालू किया जो कि बाटा कंपनी के दवरा बनाई गया पहला चमड़ा का जूता था ,अपने खास डिजाइन सिंपलिसिटी ,और हल्की वजन होने के कारण यह खूब चर्चित हुई और यही सब कारण था कि इस जूते की खूब बिक्री हुई।
- 1908 टॉमस बाटा या यूं कहें कि बाटा कंपनी के लिए थोड़ा उतार चढाव का साल रहा क्योंकि इसी वर्ष में टॉमस बाटा के भाई एंटोनी की मृत्यु हो गई और उनकी बहन एन्ना की शादी हो गई ,शादी हो जाने के बाद वह बाटा कंपनी से जुडी नहीं रह सकी। अब टॉमस बाटा अकेले रह गए थे पर फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने दो और छोटे भाइयों जैन और बोहुस को अपने साथ लेकर कंपनी को आगे बढ़ाया , और पिछली घटनाओं का ज्यादा असर कंपनी की बिक्री पर नहीं होने दिया यह टॉमस बाटा की मेहनत का ही नतीजा था की 1912 तक आते-आते इस कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या कुल मिलाकर 600 से ज्यादा हो गई थी।
- 1914 में जब प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई तो बाटा कंपनी को बहुत ही भारी मात्रा में सैनिकों के लिए जूते के आर्डर आने लगे क्योंकि बाटा के द्वारा जो जूता बनाया जाता था वह बहुत ही उच्च गुणवत्ता का होता था ,अब बिक्री इतनी होने लगी थी या दूसरे रूप में यूं कहें कि जूतों की इतनी मांग होने लगी की कि बाटा कंपनी को अपने कर्मचारियों की संख्या अचानक से 10 गुनी करनी पड़ी पर जैसे ही विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो चारों तरफ आर्थिक मंदी छा गई सारे दुकान एक एक करके बंद होने लगे बाटा कंपनी के ऊपर भी संकट छा गया और यह एक बहुत ही मुश्किल परिस्थिति हो गई थी बाटा कंपनी के लिए पर उस समय भी टॉमस बाटा ने हिम्मत नहीं खोया और एक बहुत ही बड़ा या यूं कहें कि बिजनेस जगत का बहुत ही बड़ा फैसला लेने के बारे में सोचा वो था अपने सारे जूतों के दाम को आधा करने का उनके इस फैसले से बिजनेस जगत में हलचल सी मच गई, मैनेजर जो उनकी मैनेजमेंट को संभाल रहे थे उन्होंने उन्हें यह बड़ा फैसला रोकने से रोकना चाहा पर टॉमस बाटा कहां मानने थे और उन्होनें वही किया जो वह करना चाहा और कर डाले अपने सारे जूतों के दाम आधे ,और साथ ही साथ उन्होंने अपने सभी कर्मचारियों से उनकी सैलरी 40 पर्सेंट कम करने की अनुमति मांगी जिसे सभी कर्मचारियों ने खुशी-खुशी अपनी अनुमति दे दी बदले में टॉमस बाटा की तरफ से उन्हें खाने, रहने और साथ ही साथ उनके सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की गई , उनका यह आईडिया काम कर गया और वैसे आर्थिक मंदी के दौर में भी उनकी जूतों की खूब बिक्री हुई और जल्द ही सारे कर्मचारियों की उनकी पूरी सैलरी मिलने लगी।
- 12 जुलाई 1932 का दिन बाटा कंपनी के लिए काला दिन बनके आया जब जलीं हवाई अड्डे पर उनका प्लेन उतर रहा था तभी खराब मौसम होने के कारण उनका प्लेन क्रैश हो गया और 56 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई, तब तक वे बिजनेस जगत की बहुत बड़ी कंपनी की नींव रख कर उन्हें मजबूत कर चुके थे ,जिस समय उनकी मृत्यु हुई उस समय कुल मिलाकर बाटा कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या 16500 थी उनकी मृत्यु होने के बाद बाटा कंपनी का नियंत्रण उनके भाई जैन और बेटा थॉमस जॉन बाटा के हाथों में आ गया इन दोनों ने कंपनी को संभाला और टॉमस बाटा के नक्से कदम पर चलते हुए कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए खूब मेहनत किया यही कारण था की 1950 से 1970 ईस्वी तक सभी प्रमुख खेलों के लिए उनके जरुरत के मुताबिक जूतों का निर्माण बाटा कंपनी के द्वारा किया गया।
- 1980 में हुए मेक्सिको फुटबॉल में फुटबॉल के महान खिलाड़ी में से एक माने जाने वाले डिएगो माराडोना ने जो जूता पहनकर खेला वह बाटा के कंपनी के द्वारा ही बनाया था और यह विश्व कप बाटा कंपनी के लिए इसलिए भी यादगार रहा की यह इस विश्वकप का प्रायोजक भी था।
- अगर बात करें भारत की तो भारत में इस कंपनी का आगमन 1931 में हुआ वर्तमान में भारत में कूल मिलाकर 5 फैक्ट्री और 2 चर्मशोधालय है ,पटना के पास मोकामाघाट स्थित चर्मशोधालय एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चर्मशोधालय है।
- एक अनुमान के मुताबिक यह कंपनी रोज दुनियभर में प्रतिदिन एक लाख जूते बेचती है , वर्तमान में तो यह कंपनी 90 देशों तक फैल चुकी है जिस में ज्यादातर देश ऑस्ट्रेलिया ,एशिया और यूरोप महादेश के हैं जहाँ इनका कूल मिलाकर 5250 रिटेल शॉप अभी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों की कुल मिलाकर संख्या 30 हजार तक पहुंच गई है जो दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

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